जी चाहता हे…..



कभी अपनी हसी पर भी गुस्सा आता हे
,

कभी सरे जहाँ को हसाने को जी चाहता हे |

कभी छुपा लेते हे गमो को दिल के किसी कोने में,

कभी किसीको सब कुछ सुनाने को जी चाहता हे |

कभी रोते नहीं दिल तुट जाने पर भी,

और कभी बस युही आंसु बहाने को जी चाहता हे |

कभी हसी सी आ जाती हे भीगी यादो में,

तो कभी सब कुछ भूल जाने को जी चाहता हे |

कभी अच्छा सा लगता हे आज़ाद उड़ने को,

और कभी किसीकी बाहों में सिमट जाने को जी चाहता हे |

कभी लगते हे अपने बेगानों से,

कभी बेगानेको अपना बनाने को जी चाहता हे |

कभी सोचते हे की हो कुछ नया इस जिंदगी में,

और कभी बस युही जीये जाने को जी चाहता हे |

4 thoughts on “जी चाहता हे…..

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